famous ghazal by Ahmad faraz

      Some famous ghazal by ahmad faraz

Ahmad faraz shayari
Ahmad faraz


अहमद फ़राज़ की कुछ प्रमुख और प्रसिद्ध ग़ज़लें

1.
रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम* न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे* दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ=

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत* का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया* से भी महरूम*
ऐ राहत-ए-जाँ* मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम* को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

* मरासिम – प्रेम-व्यहवार
* रस्मों-रहे – सांसारिक शिष्टाचार
* पिन्दार-ए-मोहब्बत – प्रेम का गर्व
* लज़्ज़त-ए-गिरिया – रोने का स्वाद
* महरूम – वंचित
* राहत-ए-जाँ – प्राणाधार
* दिल-ए-ख़ुशफ़हम – किसी की ओर से अच्छा विचार रखने वाला मन

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2.
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों* में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों* में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बड़ता है शरबें जो शराबों में मिलें

आज हम दार* पे खेंचे गये जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों* में मिलें

अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है “फ़राज़”
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

* खराबों – खंडहर
* हिजाबों – पर्दों
* दार – फांसी घर
* निसाबों – पाठ्यक्रम, ग्रन्थ
* माज़ी – अतीत काल
* सराबों – मृगतृष्णा
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3.
इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ

इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र* करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा* हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ

* उज्र  =  दलील, माफ़ी
* मुब्तिला = शामिल, इन्वोल्व
* क़बा  =  ड्रेस

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4.
तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बेरहम हैं दोस्तो

तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बेरहम हैं दोस्तो
अब हो चला यक़ीं के बुरे हम हैं दोस्तो

किस को हमारे हाल से निस्बत है क्या करें
आँखें तो दुश्मनों की भी पुरनम हैं दोस्तो

अपने सिवा हमारे न होने का ग़म किसे
अपनी तलाश में तो हम ही हम हैं दोस्तो

कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा
कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो

इस शहर-ए-आरज़ू से भी बाहर निकल चलो
अब दिल की रौनक़ें भी कोई दम हैं दोस्तो

सब कुछ सही “फ़राज़” पर इतना ज़रूर है
दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम हैं दोस्तो

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5.

तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ

तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ

तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ

ख़ुद अपने आपको परखा तो ये नदामत है
के अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ

मेरी बका ही मेरी ख़्वाहिश-ए-गुनाह में है
मैं ज़िन्दगी को कभी ज़हर-ए-पारसाई* न दूँ

जो ठन गई है तो यारी पे हर्फ़* क्यूँ आए
हरीफ़-ए-जाँ* को कभी तान-ए-आशनाई* न दूँ

ये हौसला भी बड़ी बात है शिकस्त के बाद
की दुसरो को तो इलज़ाम-ए-ना-रसाई न दूँ

मुझे भी ढूँढ कभी मह्व-ए-आईनादारी*
मैं तेरा अक़्स हूँ लेकिन तुझे दिखाई न दूँ

‘फ़राज़’ दौलत-ए-दिल है मता-ए-महरूमी*
मैं जाम-ए-जम के एवज़ कासा-ए-गदाई* न दूँ

मह्व-ए-आईनादारी  =  आईने को पकड़ने में व्यस्त
बका  =  अमरता, स्थायित्व
ज़हर-ए-पारसाई  =  भक्ति के तहत
हर्फ़  =  कलंक
हरीफ़-ए-जाँ   =  जीवन की प्रतिद्वंद्वी
तान-ए-आशनाई  =  परिचित का ताना
मता-ए-महरूमी  =  अभाव की वस्तु
कासा-ए-गदाई  =  भिखारी का कटोरा

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6.
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वरना इतने तो मरासिम* थे के आते जाते

शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब्* से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमां जलाते जाते

कितना आसां था तेरे हिज्र* में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

जश्न-ए-मकतल* ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पाब-जूलां* ही सही नाचते गाते जाते

उसकी वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा* था के न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ से तो निभाते जाते

मरासिम = संबंध
शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब् = अँधेरी रात की शिकायत
हिज्र = जुदाई
मकतल = कत्लखाना
पाब-जूलां = जंजीर से बंधे हुए पैर
पास -ए -वफ़ा = प्यार के लिए सम्मान

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7.



दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अन्दाज़ है ज़ालिम का ज़मानेवाला
(जालिम  =  अत्याचारी )
अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा
सख़्त नादिम है मुझे दाम में लानेवाला
(नादिम  =  लज्जित : दाम  =  जाल, बंधन )
सुबह-दम छोड़ गया निक़हते-गुल की सूरत
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला
(निक़हते-गुल  =  गुलाब की ख़ुश्बू की तरह;  ग़ुंचा-ए-दिल  =  दिल की कली)
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जानेवाला
(मरासिम  =   मेल-जोल)
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आनेवाला
मुंतज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आयेगा यहाँ कौन है आनेवाला
(मुंतज़िर  =  प्रतीक्षारत)
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बतानेवाला
(बहारों  =  वसंत ऋतुओं;  ताबीर  =  स्वप्नफल)
क्या ख़बर थी जो मेरी जान में घुला है इतना
है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला
सर-ए-दार  =  सूली तक
तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो “फ़राज़”
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलानेवाला
(तक़ल्लुफ़  =  औपचारिकता;  इख़लास =  प्रेम)
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